वरिष्ठ अधिवक्ता सतीश टम्टा के अनुसार, अगर किसी आरोपी को बरी किया जाता है तो अदालत उसे 'धारा 437A CrPC' के तहत एक बॉन्ड साइन करने को कहती है।
इसका मतलब है कि आरोपी भविष्य में किसी भी अपील की सुनवाई के दौरान कोर्ट में पेश होने का वादा करता है ।
अगर आरोपी इस बॉन्ड का पालन नहीं करता है, तो अदालत उसके खिलाफ, पहले जमानती वारंट (Bailable Warrant) और उसके बाद गैर-जमानती वारंट जारी कर सकती है ।
आरोपी के अनुपस्थिती मे भी सुनवाई हो सकती है और
अगर फैसला CBI के पक्ष में जाता है तो मामला फिर से ट्रायल कोर्ट में जाएगा।
वरिष्ठ अधिवक्ता सतीश
टम्टा के मुताबिक, कानूनी प्रक्रिया साफ है, बेल बॉन्ड के तहत कोर्ट में पेश होना अनिवार्य है।
हलाकी अलग-अलग वकील अपनी अलग राय भी दे रहे हैं ।
Editor- Amit Jha
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