अमित मालवीय ने ट्विटर पर कांग्रेस पर निशाना साधते हुए लिखा -

यह ज़रूरी है कि हमारी नई पीढ़ी जाने कि किस तरह कांग्रेस पार्टी ने पंडित नेहरू की अध्यक्षता में अपने मज़हबी एजेंडे को बढ़ावा देते हुए 1937 के फ़ैज़पुर अधिवेशन में केवल कटा-छँटा ‘वंदे मातरम्’ ही पार्टी का राष्ट्रगीत बनाया था।
आज जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने निर्दिष्ट आधिकारिक समारोहों में ऋषि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की अमर और आत्मा को उद्वेलित करने वाली रचना ‘वंदे मातरम्’, जो भारत का राष्ट्रीय गीत है, का पूर्ण गायन अनिवार्य करने हेतु नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं, तब यह याद करना आवश्यक है कि यही ‘वंदे मातरम्’ कभी हमारी राष्ट्रीय एकता और स्वाभिमान की आवाज़ बना था—जो हमारी माँ भारती की महिमा का उत्सव मनाता था और देशभक्ति तथा एकता की भावना जगाता था।
ब्रिटिश शासन ने ‘वंदे मातरम्’ का उच्चारण तक अपराध घोषित कर दिया था, क्योंकि यह गीत जन-जन को आज़ादी के लिए एकजुट कर रहा था। इस गीत का किसी धर्म या भाषा से कोई संबंध नहीं था, लेकिन कांग्रेस ने इसे धर्म से जोड़कर ऐतिहासिक पाप किया।
नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस ने धार्मिक कारणों का हवाला देकर जानबूझकर ‘वंदे मातरम्’ की वे पंक्तियाँ हटा दीं, जिनमें माँ दुर्गा की स्तुति थी।
1 सितम्बर 1937 को लिखे एक पत्र में नेहरू ने लिखा कि ‘वंदे मातरम्’ में देवी का संदर्भ जोड़ना मूर्खता है। उन्होंने यह तक कहा कि यह गीत राष्ट्रगीत के रूप में उपयुक्त नहीं है।
वहीं, नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने ‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण संस्करण के समर्थन में ज़ोरदार तर्क दिए। परंतु 20 अक्तूबर 1937 को नेहरू ने नेताजी को पत्र लिखकर कहा कि ‘वंदे मातरम्’ की पृष्ठभूमि मुस्लिमों को चिढ़ा सकती है, और इस पर विरोध जताने वालों की बात में “कुछ दम है।”
1937 में नेहरू ने ‘वंदे मातरम्’ से माँ दुर्गा का उल्लेख हटाया, तो 2024 में राहुल गांधी ने उसी मानसिकता को दोहराते हुए कहा—“हिंदू धर्म में एक शब्द है ‘शक्ति’, और हम शक्ति से लड़ रहे हैं।”
अर्थात, नेहरू की हिंदू-विरोधी सोच आज राहुल गांधी में उसी तीखेपन से झलकती है।
‘वंदे मातरम्’ केवल एक गीत नहीं, यह भारत की आत्मा की पुकार है—जिसे कांग्रेस ने दबाने की कोशिश की,
और जिसे आज प्रधानमंत्री मोदी जी फिर से जन-जन तक पहुँचा रहे हैं।
Editor- Amit Jha
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